Ritucharya in hindi | आयुर्वेद के अनुसार ऋतुचर्या (भाग-१)

Ritucharya In Hindi”  इस लेख में आप जानेंगे कि हमें ऋतुओं के अनुसार अपने दैनिक जीवन में आचरण, आहार-विहार, और रहन-सहन को किस तरह रखना चाहिए जिससे हम अपने स्वास्थ की रक्षा और वृद्धि कर पाए।

एक वर्ष में मुख्य रूप से तीन ही ऋतुएँ होती है – शीत ऋतु, ग्रीष्म ऋतु और वर्षा ऋतु। किन्तु आयुर्वेद ने छः ऋतुएँ मानी है। यह छः ऋतु २-२ माह की मानी गई है।

संवत्सर के अनुसार छः ऋतु इस प्रकार है –

शिशिर - माघ और फाल्गुन। 
वसंत - चैत्र और वैशाख। 
  ग्रीष्म - ज्येष्ठ और आषाढ़। 
  वर्षा - सावन और भादों। 
      शरद - आश्विन और कार्तिक। 
हेमंत - अगहन और पौष। 

एक वर्ष के काल को संवत्सर कहते है। संवत्सर के दो भाग होते है जो अयन कहलाते है – उत्तरायन और दक्षिणायन।

उत्तरायन और दक्षिणायन

उत्तरायन में पहली तीन ऋतुएँ शिशिर, वसंत और ग्रीष्म आती है। उत्तरायन को आदान काल भी कहते है। इस काल में सूर्य बलवान होता है क्योकिं इस समय सूर्य भारत के पास होता है जिससे तेज गर्मी पड़ती है। सूर्य अपनी प्रखर एवं तीव्र किरणों से जल, पृथ्वी, वनस्पति, मनुष्य आदि से स्नेह अंश (जलीयता एवं चिकनाई) को खींच लेता है।

दक्षिणायन में वर्षा, शरद और हेमंत ऋतु होती है। इसे विसर्ग काल भी कहते है। इस काल में चंद्र बल बढ़ जाता है और सूर्य बल क्षीण हो जाता है क्योकि इस समय सूर्य भारत से दूर हो जाता है। इस काल में जल, पृथ्वी, वनस्पति, मनुष्य आदि में स्नेह अंश की वृद्धि होती है।

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ऋतु सम्बन्धी सम्पूर्ण विवरण | All details relating to seasons
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ऋतु सम्बन्धी सम्पूर्ण विवरण | All details relating to seasons

इन chart में रसों का भी वर्णन किया गया है। मीठा, खट्टा, नमक, तीखा, कड़वा, कसैला यह छः रस होते है। आयुर्वेद कहता है कि सभी ऋतुओं में प्रतिदिन सभी (छ:) रसों का सेवन करना चाहिए तथा जिस – जिस ऋतु में जिन – जिन रसों के सेवन का विशेष निर्देश दिया गया है , उस-उस ऋतु में उस-उस रस का अधिक सेवन करना चाहिए।

महर्षि चरक इस प्रकार कर रहे हैं —
 ' सर्वरसाभ्यासो बलकराणाम् '  तथा  ' एकरसाभ्यासो दौर्बल्यकराणाम् ' । 
                                                                                               ( च.सू.  २५|४० )

अर्थात् मधुर आदि छहों रसों का प्रतिदिन सेवन करने से देह तथा इन्द्रियों का बल बढ़ता है , इसके विपरीत आचरण करने से बलहानि होती है । आज की भाषा में ये सभी रस विटामिनों से भरपूर है और इनसे शरीर के उन आवश्यक तत्वों की पूर्ति होती है , जिनकी प्रतिदिन शरीर को आवश्यकता पड़ती रहती है ।

ऋतुचर्या क्यों आवश्यक है ? Ritucharya requirement in hindi

हमारे शरीर पर भोजन के अतिरिक्त ऋतुओं का भी प्रभाव पड़ता है। प्रत्येक ऋतु में वात, पित्त, कफ आदि दोषों में से कोई दोष बढ़ता है, तो कोई शान्त होता है। इसीलिए आयुर्वेद में अलग-अलग ऋतुओं में दोषों में होने वाले संचय, प्रकोप और शमन के अनुसार सब ऋतुओं के लिए अलग-अलग प्रकार के आहार-विहार और रहन-सहन का उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार आहार-विहार अपनाने से स्वास्थ्य की रक्षा होती है तथा हम रोगों से बचा रहता है।

संचय – विक्षिप्त (विकृत) दोषों का उनके मुख्य स्थान पर संग्रह (जैसे – आँत में वात दोष) प्रकोप – शरीर के अन्य मुख्य स्थानों में विक्षिप्त (विकृत) दोषों का संग्रह (जैसे रीढ़ के निचले हिस्से में वात दोष) शमन – दोषों का विकार के बाद सामान्य स्थिति में वापस आना।

ऋतुओं के क्रम में वातादि दोषों का संचय-प्रकोप-शमन की तालिका (Table) :

दोष संचय प्रकोप शमन
वात ग्रीष्म वर्षा शरद
पित्त वर्षा शरद हेमंत
कफ शिशिर वसंत ग्रीष्म

इस Table को कैसे पढ़ना चाहिए, यह हम एक उदहारण से समझते है।
उदाहरण – वात ग्रीष्म ऋतु (गर्मी) के दौरान आँतो में जमा हो जाता है और वर्षा (बरसात) के मौसम में पीठ के निचले हिस्से में जमा हो जाता है, और अंत में यह शरद ऋतु के मौसम में सामान्य हो जाता है।
इस उदाहरण से आपको Table को बेहतर ढंग से पढ़ने में मदद मिलेगीं।

शीतकाल (हेमंत और शिशिर) के लिए ऋतुचर्या | Shitkaal Ritucharya in hindi

हेमंत और शिशिर यह दोनों ऋतु शीतकाल में ही होती है। शीतकाल में विसर्गकाल की समाप्ति और आदानकाल की शुरुआत होती है। “शीतकाल की यह विशेषता होती है कि इस काल में आदान काल और विसर्ग काल की संधि होती है अतः दोनों काल के गुण – धर्म इसमें उपलब्ध रहते है।”

दोनों ऋतुओं में ठण्ड तो एक जैसी ही पड़ती है परन्तु शिशिर ऋतु से हवा में तीखापन आ जाता है, मावठा गिरने लगता है जिससे शीत का प्रकोप बढ़ जाता है।

इस ऋतु में जठराग्नि प्रबल होती है जिससे पाचन – शक्ति बहुत अच्छी रहती है। यह इस कारण होता है क्योकि बाहर के ठंडे वातावरण का प्रभाव हमारे शरीर के ऊपर पर पड़ता रहता है जिससे अंदर की उष्णता (गर्मी) बाहर नहीं निकल पाती और अंदर ही अंदर एकत्रित होकर जठराग्नि को प्रबल करती है।

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Shitkaal Ritucharya in hindi –

शीतकाल की ऋतुचर्या इस प्रकार है | Shitkaal Ritucharya in hindi :

आहार

शीतकाल में भारी आहार भी ठीक से पच जाते है और शरीर को बल प्राप्त होता है। इस ऋतु का पूर्ण लाभ उठाने के लिए हमें पौष्टिक, शक्ति वर्द्धक और गुणकारी पदार्थो का सेवन करना चाहिए। किन्तु शीतकाल आरम्भ होते ही हमें पौष्टिक आहार लेना प्रारम्भ नहीं कर देना चाहिए, जब अच्छी तरह से ठण्ड पड़ने लग जाये तब से ही प्रारम्भ करना चाहिए।

इस ऋतु में पथ्य (सेवन योग्य) पदार्थ – घी से बने पदार्थ, गुड़ से बने पदार्थ, गेहूँ का आटा, चने की रोटी, बाजरा, उड़द की दाल, दूध द्वारा निर्मित पदार्थ ( मलाई, मक्खन, रबड़ी आदि ), चावल की खीर, मिश्री, तिल, हरी सब्जियाँ, मौसमी फल, अदरक, सौंठ, सभी प्रकार के सूखे मेवे, भीगे हुए देशी काले चने आदि का सेवन करना चाहिए।

विहार

आहार के साथ – साथ विहार (lifestyle) भी महत्वपूर्ण होती है। सभी ऋतुओं का अलग – अलग करने योग्य विहार होता है। इसके विपरीत करने से हमें हानि होती है। प्रातः काल सूर्योदय से पहले उठ कर शौच, स्नानादि से निवृत होकर वायुसेवन करना चाहिए। हमें अभ्यंग (शरीर पर तेल की मालिश) करना चाहिए। कसरत करना, योग करना, धूप स्नान करना, आदि कार्य करने चाहिए।

इस ऋतु में हमें ठण्ड से बचाव करना चाहिए। इस मौसम में ठण्ड लगने से सर्दी, खाँसी, बुखार आदि हो सकते हैं। गर्म स्थान में रहना चाहिए। गर्म वस्त्र पहनना चाहिए। रात को हल्दी का दूध लेना चाहिए।

अपथ्य ( न करने योग्य )

इस ऋतु में अधिक ठंडा पानी पीना, ठण्ड सहना, कम खाना, ज्यादा उपवास करना, ज्यादा ठंडी प्रकृति वाली वस्तु का सेवन करना (आइसक्रीम आदि), दिन में सोना, देर रात तक जागना, सुबह देर से उठना, व्यायाम न करना, अधिक स्नान, रात को देर से भोजन करना और भोजन के तुरन्त बाद सो जाना, ये सब अपथ्य हैं।

हमें आशा है कि आपको यह लेख पसंद आया होगा। 
यह इस श्रृंखला का भाग-1 है, हम भाग-2 में शेष ऋतुओं को सम्मिलित करेंगे। 
हमसे कुछ भुल हुई तो कृपया हमें बताएं या आप कुछ सुझाव देना चाहते है तो Comment करे या हमसे संपर्क करे। 

पढ़िए ऋतुचर्या का अगला भाग – Ritucharya In Hindi | आयुर्वेद के अनुसार ऋतुचर्या (भाग-२)

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