Ritucharya In Hindi | आयुर्वेद के अनुसार ऋतुचर्या (भाग-२)

“Ritucharya in Hindi” इस श्रृंखला का यह भाग-2 है। भाग-1 यहाँ पढ़े : Ritucharya (भाग-१)

हमने पिछले भाग में कितने प्रकार की ऋतुएँ होती है, उत्तरायन और दक्षिणायन क्या है, इनमे कौन – कौन सी ऋतुएँ आती है तथा हेमंत और शिशिर ऋतु की चर्चा की थी। अब हम आपको शेष सभी ऋतुओं के बारे में बताएँगे।

वसंत, ग्रीष्म, वर्षा एवं शरद ऋतु में क्या करना चाहिए, कैसा आहार लेना चाहिए आदि हम आपको बताते है जिससे आप अपने स्वास्थ की रक्षा और वृद्धि कर पाए।


वसंत ऋतु के लिए ऋतुचर्या | Vasant Ritucharya in Hindi

शीतकाल के बाद वसंत ऋतु प्रारम्भ होती है। वसंत ऋतु एक सुहावनी एवं मनमोहक ऋतु होती है। इस ऋतु में हवा सुहानी हो जाती है, वृक्षों पर कोयल की मीठी आवाज आने लगती है, सभी वृक्षों पर नई पत्तियाँ और फूल आ जाते है। इन सभी कारणों से वसंत को “ऋतुराज” भी कहा है।

वसंत ऋतु शीतकाल और ग्रीष्मकाल का ‘संधिकाल’ होता है। इस कारण वसंत ऋतु में थोड़ा – थोड़ा दोनों ऋतुओं का असर होता है। प्रकृति ने यह इसलिए करा है ताकि हम शीतकाल (ठण्ड) को छोड़ने और ग्रीष्मकाल (गर्मी) में प्रवेश करना के अभ्यस्त (habitual) हो जाये।

शीतकाल में शरीर में जो कफ संचय हो जाता है, वह वसंत ऋतु में कुपित हो जाता है और कफ से होने वाले रोग (जैसे- खाँसी, जुकाम, गले की खराश, आदि) उत्पन्न हो जाते हैं। अतः इस ऋतु में आहार-विहार का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

Ritucharya-In-Hindi
Vasant Ritucharya in hindi

आहार

वसंत ऋतु में भारी, खट्टे, चिकने और मीठे पदाथों का सेवन नहीं करना चाहिए। इस ऋतु में सुपाच्य अर्थात् आसानी से पचने वाला आहार लेना चाहिए। कटु, तीक्ष्ण और कषाय रस युक्त पदार्थों का सेवन लाभकारी है। भोजन में पुराना गेहूँ और चावल, छिलके वाली मूंग की दाल, हरी सब्जियाँ, मौसम के फल, अदरक, शहद आदि का प्रयोग लाभकारी है। जल अधिक मात्रा में पीना चाहिए। शहद को पानी के साथ मिलाकर लेना चाहिए।

चैत्र मास में प्रतिदिन प्रातःकाल नीम की १०-१५ कोपल (नए पत्ती) खूब चबा-चबाकर खा लेना चाहिए। इससे पुरे वर्ष आपको चर्मरोग, रक्तविकार और बुख़ार आदि से बचने की क्षमता उत्पन्न होती है। इन दिनों मौसम का संतुलन ठीक नहीं रहता जिससे मौसमी बीमारियाँ होती है। इनसे बचने के लिए रात को हल्दी वाला दूध, तुलसी का काढ़ा आदि लेते रहना चाहिए।

विहार

इस ऋतु में प्रातः जल्दी उठना चाहिए। प्रातःकाल की वायु का सेवन करना चाहिए, योग तथा हल्का व्यायाम करना चाहिए, तेल मालिश करना चाहिए। इस ऋतु में रात को देर तक जागना, सुबह देर तक सोना और दिन में सोना उचित नहीं है। सूर्यास्त से पूर्व ही भोजन कर लेना चाहिए।


ग्रीष्म ऋतु के लिए ऋतुचर्या | Grishma Ritucharya in Hindi

ग्रीष्म ऋतु आदानकाल की चरम सीमा होती है। सूर्य का तेज और उसकी उष्ण किरणें पृथ्वी का जलीय अंश और चिकनाई को सोख लेती हैं। नदी, तालाब आदि सूखने लगते है, वृक्षों की हरियाली नष्ट होती है और सभी प्राणियों के शरीर का जलीय अंश भी कम होता है, इसलिए हमें प्यास भी अधिक लगती है।

इस ऋतु में दो बातों का ध्यान ज्यादा रखना चाहिए कि – १. हमारे शरीर में पानी की कमी नहीं हो पाए। २. पेट ख़राब न हो (अपच या कब्ज न हों)।

शरीर को स्वस्थ बनाए रखने के लिए सौम्यता एवं चिकनाई की आवश्यकता होती है। इस समय हमें अत्यधिक प्यास लगना, ज्वर होना, जलन होना, चक्कर आना, सिर दर्द आदि रोग भी हो सकते हैं। इन सभी रोगों व दुर्बलता से बचाव करने के लिए आयुर्वेद ने इस ऋतु के लिए निम्न आहार – विहार बताएँ है।

Ritucharya-In-Hindi
Grishma Ritucharya in Hindi

आहार

ग्रीष्म ऋतु में मीठे, शीतल प्रकृति के, चिकनाई वाले, रसीले पदार्थो का सेवन करना चाहिए। भोजन में हलके और सुपाच्य पदार्थो का ही सेवन करे। देशी खांड या मिश्री का उपयोग करे (चीनी का नहीं)।

शाम के भोजन के २ घंटे बाद एवं रात को सोने से आधा घंटा पहले एक गिलास दूध में १ चम्मच देसी गाय का घी डालकर पीना चाहिए। दिन में मटके का ठण्डा पानी पीते रहिए। फ्रिज में रखा पानी नहीं पीना चाहिए, मटके का पानी ही श्रेष्ठ है

सत्तू का सेवन करिए इससे ठंडक मिलती है। दोपहर में तरबूज, खरबूज आदि कोई भी मौसमी फल खाना चाहिए।नारियल पानी, सौंफ, मिश्री-मक्खन का सेवन हितकारी होता है। इस ऋतु में हमें भूख से थोड़ा कम ही खाना चाहिए।

विहार

ग्रीष्म ऋतु में तेज धूप, गरम हवा और ज्यादा गर्मी में रहना से बचना चाहिए। घर से बाहर जाते समय पानी पीकर ही जाये और सिर को धूप से बचाये इससे लू नहीं लगती। इन दिनों सुबह जल्दी उठकर, नित्यकर्म से निवृत्त होकर सूर्योदय के पूर्व टहलने जाना चाहिए।

अपथ्य ( न करने योग्य )

नमकीन, खट्टे, कटु रस वाले तथा गरम प्रकृति के पदार्थ, तले हुए और तेज मिर्च – मसाले वाले पदार्थो का सेवन बहुत कम करना चाहिए। जो लोग चाय, ध्रूमपान, मद्यपान आदि का सेवन करते है उन्हें कई प्रकार के रोग होते है।


वर्षा ऋतु के लिए ऋतुचर्या | Varsha Ritucharya in Hindi

वर्षा ऋतु से सूर्य दक्षिणायन हो जाता है और ‘विसर्ग काल’ प्रारम्भ हो जाता है। होंगे । वर्षा ऋतु में, प्रारम्भ के दिनों में वर्षा का जल जब गर्मी से तप्त हुई भूमि पर गिरता है तो भूमि से भपके छूटते हैं, इन दिनों हमारी जठराग्नि ( पाचक अग्नि ) अत्यन्त क्षीण हो जाती है जो कि ग्रीष्म ऋतु और आदान काल के प्रभाव से पहले से ही क्षीण हो चुकी होती है। इससे वर्षा काल में खास कर वात दोष कुपित रहता है ।

यह ऋतु सुहानी भी लगती है क्योंकि ग्रीष्म काल की भयानक गरमी से राहत मिलती है। वर्षाकाल तभी सुहाना लग सकता है जब हमारा स्वास्थ्य अच्छा और शरीर निरोग हो अन्यथा कोई लाभ नहीं क्योंकि तब न तो हम भुट्टे सेक कर खा सकेंगे, न गरम – गरम भजिए खा सकेंगे जो कि वर्षा के दिनों में बनाये , खाये जाते हैं। इसके लिए पाचनशक्ति अच्छी हो यह ज़रूरी है वरना दस्त , अतिसार आदि की शिकायत हो जाती है।

Ritucharya
Varsha Ritucharya in Hindi

आहार

वर्षाकाल में सबसे महत्वपूर्ण और ध्यान देने योग्य है जल की शुद्धता क्योंकि इन दिनों नदी-तालाब आदि का जल दूषित और गन्दा हो जाता है। इन दिनों यदि जल दूषित और मैला हो तो इसे उबाल कर ठण्डा करके पीना चाहिए।

इस मौसम में खास चीज़ होते हैं आम और मक्का के भूट्टे । इनको सेवन करने में कुछ सावधानियां रखना चाहिए । आम खट्टा न हो , बदबूवाला और खराब स्वाद का न हो । इसे चूस कर खाना और ऊपर से मीठा दूध पीना चाहिए। इसका रस निकाल कर आम रस बनाया व खाया जाता है । इस रस में भी उचित मात्रा म दूध मिलाया जाता है । दूसरी चीज़ है मक्का के भुट्टे । नरम व काया दाने वाले ताजे भुट्टे सेक कर खाना चाहिए । इन्हें खूब चबा – चबा कर खाना पीने से ये जल्दी हज़म हो जाते हैं ।

वर्षा ऋतु में हल्के, सुपाच्य, ताजे, गर्म पदार्थों का सेवन हितकारी है। वात को शान्त करने वाले पदार्थ का सेवन करना चाहिए। पुराना अनाज, जैसे गेहूँ, जौ, सरसों, राई, दही, मूँग की दाल, अरहर की दाल, लौकी, भिण्डी, तोरई, टमाटर तथा घी व तेल से बने पदार्थ उपयोगी होते हैं। 

इन दिनों गाय – भैंस कच्ची घास खाते हैं , इससे उनका दूध दूषित रहता है इसलिए श्रावण मास में दूध और भादों में छाछ का सेवन करना तथा श्रावण में हरी पत्ती वाली शाक सब्जी का सेवन करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है।

विहार

इन दिनों मच्छरदानी लगा कर सोना उचित है ताकि मच्छर न काट सके और मलेरिया आदि रोगों से बचाव हो सके। इन दिनों शरीर की साफ़ – सफ़ाई का पूरा ध्यान रखना चाहिए और प्रतिदिन धुले हुए कपड़े पहनना चाहिए। अशुद्ध और दूषित जल का सेवन करने से चर्म रोग, पीलिया रोग, अतिसार जैसे रोग हो जाते हैं। प्रतिदिन शुद्ध जल से स्नान करना चाहिए। इन दिनों ज्यादा परिश्रम या व्यायाम नहीं करना चाहिए। दिन में सोना, वर्षा में ज्यादा देर तक भीगना, नदी में स्नान करना हानिकारक होता है। तैल मालिश या उबटन करके स्नान करना और हल्के वस्त्र पहनना चाहिए।


शरद ऋतु के लिए ऋतुचर्या | Sharad Ritucharya in Hindi

शरद ऋतु के दिनों में सूर्य की तेज़ किरणों के कारण बहुत प्रचण्ड गर्मी पड़ती है जिससे वर्षा ऋतु में संचित हुआ पित्त इन दिनों में कुपित होता है, यह शरद ऋतु को विशेष बात है।

यह ऋतु वर्षाकाल और शीतकाल का सन्धिकाल होती है जैसे वसन्त ऋतु शीतकाल एवं ग्रीष्मकाल की सन्धिकाल होती है। इन दिनों की धूप ग्रीष्मकाल की धूप से भी तेज़ होने से शरीर में ‘ पित्त ‘ प्राकृतिक रूप से कुपित अवस्था में रहता है। इन दिनों में पित्त बढ़ने से भूख और जठराग्नि मन्द रहती है इसिलए अच्छी भूख लगने पर ही भोजन करना चाहिए ।

Sharad
Sharad Ritucharya in Hindi

आहार

शरद ऋतु में मधुर रस युक्त , हलके , सुपाच्य , शीतल प्रकृति के तथा कुछ तीखे रस वाले पदार्थों का सेवन करना चाहिए क्योंकि ये पदार्थ पित्त का शमन करने वाले होते हैं। शरद ऋतु में दूध चावल की खीर ज़रूर खाना चाहिए । इसिलए शरद पूर्णिमा की रात को दूध चावल की खीर खाने की परम्परा है।

इन दिनों खट्टे , क्षारयुक्त , तेज़ मिर्च मसालेदार , तले हुए , बेसन के बने व्यंजनों का सेवन नहीं करना चाहिए। दिन में ६-७ गिलास पानी घण्टे – घण्टे भर से पीना चाहिए, इससे शरीर में गर्मी बढ़ने नहीं पाती।

विहार

इन दिनों सीधी धूप से बचना चाहिए। अधिक परिश्रम और व्यायाम नहीं करना चाहिए । सुगन्धित और मौसमी फूलों की माला धारण करना या फूलों की सुगन्ध लेना। इन दिनों आहार – विहार ग्रीष्म काल के आहार – विहार से मिलता-जुलता है । दिन में सोने से शरीर में ऊष्मा बढ़ती है जिससे पित्त प्रकोप बढ़ता है अतः इन दिनों दिन में सोना उचित नहीं।

निष्कर्ष

इस प्रकार षड् – ऋतुचर्या पूरी हुई। आपको इन सभी छः ऋतुओं के आहार – विहार के विवरण को ठीक से स्मरण रखना और अभी से यथाशक्ति ऐसे प्रयत्न करें कि उचित आहार – विहार करने और अनुचित आहार – विहार न करने का अभ्यास हो जाए ।

याद रखिए , स्वास्थ्य की रक्षा करने के प्रयत्न का पहला क़दम ऋतुचर्या का उचित ढंग से पालन करना ही है। यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो स्वास्थ्य की रक्षा न कर सकेंगे और पहले मौसमी बीमारियों के शिकार होंगे बाद में जो जो दोष शरीर में बढ़ेगे उनसे पैदा होने वाले रोगों के जाल में फंस जाएगे।

मानव जगत के लिए ऐसा ज्ञान देने वाला एक मात्र शास्त्र आयुर्वेद ही है, बाद में तो संसार भर के शास्त्रों ने इस विवरण का ही अनुकरण किया है। शरीर , स्वास्थ्य और चिकित्सा का आदि स्रोत आयुर्वेद ही है जिसने सम्पूर्ण मानव जाति को सबसे पहले यह ज्ञान दिया और ज्ञान भी ऐसा कि जिसकी कोई बात आज भी ग़लत सिद्ध नहीं हो पाती । हमें इस अद्भुत शास्त्र का अध्ययन करना चाहिए और पालन करना चाहिए।

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