आयुर्वेद के अनुसार भोजन के 10 नियम जो आपको स्वस्थ रखेंगे

इस लेख में हम आपको भोजन के नियम बताएँगे जो आप के लिए उपयोगी है।

आयुर्वेद में चिकित्सा करने की अपेक्षा सही आहार – विहार पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। जिससे हम अपने शरीर और प्रकृति के बीच उचित संतुलन बनाये रखे। यदि हम अनुचित आहार (भोजन) लेते है तो निश्चित ही हम रोगों की ओर अग्रसर होंगे।

भोजन या आहार ही हमारा प्राणरक्षक है। भोजन से ही हमारा जीवन है। भोजन ही शरीर को धारण करता है। आप जैसा आहार करेंगे वैसा ही आपका शरीर और मन रहेगा। आचार्य सुश्रुत लिखते है :-

आहारः प्रीणानः सद्यो बलकृद्देहधारकः। आयुस्तेजः समुत्साहस्मृतयोजोग्नि विवर्द्धनः।।

अर्थात ” भोजन तृप्ति करनेवाला, तत्काल ताकत लानेवाला; देह को धारण करने वाला; आयु, तेज, उत्साह, स्मरण-शक्ति और जठराग्नि को बढ़ाने वाला है।”

,आज हम आपको महर्षि वाग्भट्ट द्वारा अष्टांग हृदयम (आयुर्वेद के प्राथमिक प्राचीन मूल ग्रंथों में से एक) में बताये गए 10 महत्वपूर्ण भोजन के नियम बतायेगें जिसके पालन करने से आप को अवश्य ही लाभ होगा। इसका पालन बच्चे, बड़े सभी को करना चाहिए।

10 महत्वपूर्ण भोजन के नियम

महर्षि लिखते है कि :-

काले सात्म्यं शुचि हितं स्निग्धोष्णं लघु तन्मनाः।।

षड्रसं मधुरप्रायं नातिद्रुतविलम्भितम्। स्नातः क्षुद्धान् विविक्तस्थो धौतपादकराननः।।

तर्पयित्वा पितन देवानतिथीन् बालकान् गुरुन्। प्रत्यवेक्ष्य तिरश्च अपि प्रतिपन्नपरिग्रहान्।।

समीक्ष्य सम्यगात्मनिभनिन्दन्नभुवन् द्रवम्। इष्टमिष्टैः सहाश्रीयाच्छुचिभक्तजनाहृतम्।।

अर्थात्

१. काले सात्म्यं – (भोजन के नियम)

भोजन का सेवन हमेशा उचित समय पर करना चाहिए। नियत समय पर भोजन करना बहुत ही जरुरी है। बंधे (Fixed) हुए समय पर भोजन करने से जठराग्नि पहले के खाये हुए अन्न को आसानी से पचा लेती है। न ही समय के पहले खाना चाहिए, और न ही बाद में। अगर आप नियत समय पर नहीं खाते और हर थोड़ी देर में कुछ न कुछ खाते रहते है तो आपका शरीर पहले खाये हुए भोजन को पचा नहीं पायेगा और भोजन सड़ने लगेगा। जिससे फिर रोग होते है।

२. शुचि हितं – (भोजन के नियम)

साफ सुथरा होकर भोजन करो। अक्सर बच्चे बाहर से आते है और किचन में जाकर कुछ भी खा लेते है। भोजन के पहले हाथ अच्छे से धोना चाहिए , मुँह में कुल्ला करना चाहिए और पैरों को धोना चाहिए। भोजन के पहले पैर धोने से जठराग्नि प्रदीप्त होती है, भूख़ और अच्छे से लगती है।

३. स्निग्धोष्णं लघु – (भोजन के नियम)

स्निग्ध, उष्ण और लघु खाओ। आपका जो भोजन होना चाहिए वो स्निग्ध होना चाहिए अर्थात उसमे तेल या घी होना चाहिए क्योकि आपके शरीर में एक Cell बनने के लिए ४२% तेल या घी शरीर को चाहिए रहता है। लघु, जो आसानी से पच जाये ऐसा भोजन खाये।

४. तन्मनाः – (भोजन के नियम)

भोजन को ध्यान देते हुए करें। भोजन हमेशा एकाग्रचित होकर करना चाहिए। भोजन करते समय सब तरफ का ध्यान छोड़ देना चाहिए। आजकल लोग भोजन करते वक्त टीवी, मोबाइल चलाते रहते है।

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५. षड्रसं मधुरप्रायं – (भोजन के नियम)

आपके भोजन में सभी छह रसों होना चाहिए। मीठा, खट्टा, नमक, तीखा, कड़वा, कसैला यह छह रस होते है। आयुर्वेद कहता है कि आपके भोजन में ये सभी रस होना चाहिए। हम अधिकतर मीठा, खट्टा, नमकीन, और तीखा तो खा लेते है परन्तु कड़वा बहुत ही कम खाते है। हमारे शरीर के लिए कड़वा और कसैला भी अति आवश्यक है। कसैले में आँवला आता है।

६. नातिद्रुतविलम्भितम्

ना ज्यादा जल्दी और ना बहुत धीरे खाओ। बहुत जल्दी खाने से भोजन के गुण-दोष मालूम नहीं होते और भोजन देर से पचता है; क्योकि दाँतों का काम आँत को करना पड़ता है। भोजन को कम से कम ३२ बार चबाकर खाना चाहिए। लगभग २० मिनट में आपका भोजन होना चाहिए।

७. स्नातः

स्नान के बाद। स्नान करने के बाद ही भोजन करना चाहिए। जो लोग तुरंत भोजन कर स्नान करते है उनको आमवात होने की शिकायत रहती है। इसीलिए भोजन स्नान के बाद ही करना चाहिए और अगर आपने भोजन कर लिया है तो ३-४ घंटे बाद स्नान करो।

८. क्षुद्धान्

जब अच्छी भूख लगे। भोजन को खूब भूख लगने पर ही खाना चाहिए।

९. विविक्तस्थो

एकांत में बैठकर। भोजन को हमेशा ऐसी जगह करना चाहिए जहाँ का वातावरण शांत हो ।

१०. निंदा न करते हुए, बिना ज्यादा बात करे, मौन होकर तथा मित्रों और परिवार के साथ बैठकर शांति से भोजन करना चाहिए।

यह कुछ भोजन के नियम थे जिसका पालन हमें अवश्य करना चाहिए जिससे हम स्वस्थ और निरोगी रहे।


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